1741 और 1752 के बीच खूंखार मराठे 'बर्गिस/ बरगी। बारगी/ बारगिरियो ' ने बीरभूम के विभिन्न हिस्सों पर बार-बार हमला किया और राज्य को लूट लिया। उस समय राजमहल से जलेश्वर तक उनका कब्जा था। बात इसी दौर की है ,जब एक बार बीरभूम पर बारगियो का आक्रमण हुआ। उस समय, राजनगर के दीवान, बादी-उज़-ज़मां खान (1718-52) के दो बेटे, अहमद-उज़-ज़मान खान (1752-1777) और अलीनाकुई खान ने अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए घटवालो को बुलाया। उन्होंने बहादुर घटवाल /घटवार युवकों का चयन किया और घाटवाल रेजिमेंट का निर्माण किया, जो अपने हथियारों से उस समय सबसे खूंखार दुश्मन का भी सामना कर सकती थी। अहमद-उज़-ज़मान खान घटवालो की बहादुरी से उस समय के सबसे दुर्घर्ष लड़ाकों को हराने में सफल रहे। घटवालो की बहादुरी से मराठा आक्रमणकारियों को भागना पड़ा। आज के आमोदपुर तक उनका पीछा किया गया । उसने यहाँ एक नया नगर बसाया और उसका नाम अहमदनगर रखा। बाद में स्थानीय लोगों ने समय के साथ नाम बदल कर आमोदपुर कर दिया । बरगियों को खदेड़ने के बाद अहमद-उज़-ज़मान खान और उनकी घटवाल सेना वापस राजपुर चली गई, कुछ घटवालो ने आमोदपुर और उसके आसपास के क्षेत्र में वापस रहने का फैसला किया।
वे समूहों में रहते हैं और अभी भी राजनगर और जिले के अमोदपुर रेलवे स्टेशन के पश्चिमी भाग में पाए जाते हैं। इस इलाके को अब घटवाल पारा के नाम से जाना जाने लगा है। एक अन्य स्रोत के अनुसार, सिउरी के अंतिम शासक गुरुदास सिंह के शासनकाल के दौरान, बरगी हमले की प्रबल अफवाहें थीं और गुरुदास ने घटवाल योद्धाओं की एक सेना बनाई। वे चारदीवारी से घिरे शहर और नहर की रखवाली करते थे । मराठा आक्रमण समाप्त होने के बाद घटवालो का महत्व भी धीरे-धीरे कम हो गया।

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