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घटवाल - घटवारों की पारंपरिक प्रथा है आषाढ़ी पूजा।



धान की खेती प्रारंभ करने के पूर्व झारखंड के हर आदिवासी-मूलवासी अपनी समृद्ध परंपरा के अनुसार पूजा करते हैं। इनमें से एक पूजा है आषाढ़ी पूजा।


धान  की खेती शुरु करने पूर्व  झारखंड के घटवाल - घटवार आदिम जनजातीयीं ने हजारों साल पहले राढ़ सभ्यता का निर्माण किया था। अपने उन्नत कृषि के संरक्षण-संवर्धन, समयानुकूल पर्याप्त बारिश औरर फसलों के रोग-विघ्न आदि निवारण के लिए कृषि कार्य प्रारंभ करने के पूर्व विभिन्न पूजा व अनुष्ठानों का आयोजन तय किए। उन्होंने 13 मासें, 13 परब, 13 पूजा-पासा, 13 राइ-रइया, 13 घाट-कमान को अपमार्जित किए। इन्हीं 13 पूजाओं में एक हैं  आषाढ़ी पूजा।।


असाढ़ी पूजा एक जून से 30 जुलाई तक मनाया जाता है।।



वैसे तो असाढ़ी पूजा एक जून से 30 जुलाई तक मनाया जाता है, लेकिन अधिकांश लोग असाढ़ी पूजा रोपा मास के पहले पहर में मनाते हैं। यह मूलतः आदिवासी - मुलवासी घटवाल - घटवार आदिम जनजातियों की पूजा है। 


प्रकृति से करते आह्वान



घटवाल - घटवार जनजाति प्रकृति पूजक है। कृषि कार्य प्रारंभ करने के पूर्व प्रकृति को अह्वान कर पूजा करते हैं। घटवाल - घटवार जनजाति के धार्मिक प्रधान को पाहन, नायक, नाया या नेइआ कहते हैं ।कृषि कार्य के दौरान अलग-अलग समय में पूजा करने की परंपरा है। बिहिन (बीज) बोने से पहले "रहइन पूजा", बिहिन (पौधा) रोपने से पहले "असाढ़ी पूजा", बारि, टांड़ आदि के उपजे फसल खाने से पहले "मनसा पूजा", धान (फसल) काटने से पहले "जाहेरथान पूजा" आदि करते हैं। इस पूजा में बासमोता (गांव-गराम सोलह आना पूजा), लुगुबुरू, धरतीमांय, कपसा हाड़ी और गोड़ाइत बाबा की पूजा-अर्चना मड़इथान में होती है। रोटी-पीठा, पुआ-पकवान के साथ मुर्गा, कबूतर, बतख, पाठा यानी बकरा, भेड़ा, सुअर आदि पशु-पंक्षियों की पूजा (बलि) दी जाती है। इसके अलावा महुआ दारू या हंड़िया का तपान चढ़ाया जाता है। आदिवासियों के पारंपरिक प्रथा "पूजा" हैं । पूजा का शाब्दिक अर्थ "बलि" से हैं।।

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