जब हमारे शरीर में पैक्रियाज (अग्नाश्य) इंसुलिन का उत्पादन करना बंद कम कर देता है या बंद कर देता है तब हमारे ब्लड में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है। अगर इस स्तर को कंट्रोल ना किया जाए तो हम शुगर के रोगी बन जाते हैं।
दो तरह की होती है डायबिटीज
-डायबिटीज दो तरह की होती है। टाइप-1 और टाइप-2, इनमें टाइप-1 डायबिटीज वह है जो हमें अनुवांशिक तौर पर होती है। यानी जब किसी के परिवार में मम्मी-पापा, दादी-दादा में से किसी को शुगर की बीमारी रही हो तो ऐसे व्यक्ति में इस बीमारी की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
अग्नाशय में मुख्यतः दो प्रकार की कोशिकाओं के रूप में होती है, जिन्हे अल्फा व बीटा कोशिकाओं के नाम से जाना जाता है !
(1) अल्फा कोशिकायें :
अल्फा कोशिकाओं द्वारा निर्मित एवं स्त्रावित हार्मोन को ग्लुकागोंन कहते है! इसका कार्य इन्सुलिन के विपरित होता है!
(2) बीटा कोशिकायें :
बीटा कोशिकाओं द्वारा निर्मित एवं स्त्रावित हार्मोन को इंसुलिन कहते है! इसका कार्य शरीर मे शर्करा (शगुर) या ग्लूकोस, वसा एवं प्रोटीन के चयापचय (मेटाबोलिज्म) मे मदद करना होता है।
भोजन द्वारा हम जो भी कार्बोहायड्रेट्स (कार्बोदित पदार्थ) खाते है! वह आंतो मी विघटित होता है और शर्करा ग्लुकोज मे परिवर्तित हो जाता है और यह ग्लुकोज आंतो कि आंतरिक झिल्ली (म्युकस मेम्ब्रैंन ) से अवशोषित हो कर रक्त मे पंहुचता है फिर शरीर की प्रत्येक कोशीकाओं मे।
कोशिका मे ग्लुकोज के प्रवेश के लिये विशेष द्वार होते है जो सामान्यतः बंद रहते है !
द्वार को इन्सुलिन द्वारा खोला जाता है।
अत: इन्सुलिन वह चाभी है जिसकी मदद से कोशिकाओं पर लगे हुये ताले खुलते है तथा ग्लुकोज या शुगर इनमे प्रवेश करती है !
कोशिका सही ढंग से काम करे इसीलिए ग्लुकोज उर्जा प्रदान करता है ।
शरीर मे इन्सुलिन की कमी या इसकी कार्यक्षमता कमी से चयापचय मे गड़बड़ी हो जाती है और रक्त ग्लुकोज अधिक हो जाता है।
यह अधिक ग्लुकोज कोशिकाओं मे प्रवेश नही कर सकता ।
अत: शरीर इसका उपयोग नही कर सकता और इस स्थिति को संपन्नता मे दरिद्रता भी कह सकते है !
रक्त मे भी ग्लुकोज 180 एमजी (मिली ग्राम प्रति डेसी लिटर) से अधिक होता है तो मूत्र के जरिये बाहर फैंक दिया जाता है,
यह एक सामान्य प्रक्रिया है जिससे ग्लुकोज शरीर मे अधिक ना बढे ।
जब शरीर मे ग्लुकोज बहुत अधिक हो जाए और गुर्दे उसे पुरी तरह बाहर नही फैंक पाये तो रक्त ग्लुकोज बढने लगता है !
डायबिटीज मे मूत्र का स्वाद उसमे मौजूद ग्लुकोज की वजह से मीठा होता है इसलिये मूत्र पर चीटियाँ आ जाती हैं, सदियों पूर्व इस रोग को (डायबिटीज मेलिटस) नाम इसी कारण दिया गया था !
ग्रीक भाषा मे डायबिटीज शब्द का अर्थ है "बहना", मेलीटस शब्द का अर्थ है "मीठा",
इन्सुलिन का एक अन्य कार्य भी होता है...
शरीर मे ग्लुकोज उत्पादन का नियंत्रण इन्सुलिन के अभाव मे ग्लुकोज उत्पादन अनियंत्रित हो जाता है एवं यकृत (Liver )भारी मात्रा मे ग्लुकोज बनाने लगता है !
इन्सुलिन के अभाव मे शरीर कि सारी प्रक्रियाएं अनियंत्रित हो जाती है !
इन्सुलिन की कमी से वसा पिघलने लगती है और शरीर का वजन घटने लगता है।इसी प्रकार प्रोटीन्स भी टूटने लगते है, जिससे शरीर मे मांसपेशियों मे कमजोरी आ जाती है।
शुगर की वजह से आनेवाले कुछ सालो मे ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक लकवा, किडनी फेल्युअर, आखो की रोशनी कम होना, गॅंग्रीन, त्वचा से जुडी समस्या पुरुषो मे वैवाहिक जीवन से जुडी समस्या, मेमरी कमजोर होना, डिप्रेशन और भी बहुत तरह की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जाती हैं। इसलिये शुगर की बीमारी से बचने मे ही भलाई है।
फूड सप्लीमेंट के सेवन से लोग डायबिटीज की बीमारी से कैसे ठीक हो रहे हैं?
मित्रों Renatusnova कोई दवाई नही है!यह एक तरह का फूड सप्लीमेंट है या आप इसे आयुर्वेदिक ओषधि भी मान सकते हैं।।
शुगर की बीमारी मैं इन्सुलिन बनना बंद हो जाता है या तो बहुत कम मात्रा में इन्सुलिन बनता है,जिसके वजह से लोग इस बीमारी का धीरे - धीरे शिकार होने लगता है...,ठीक वही समय Renatusnova सीधे आपके कोशिका को जो पोषक तत्व मिलना चाहिए जिसके कारण इन्सुलिन बनना बंद हो गया है...,Renatusnova उन सारे तत्वों की पूर्ति इन्सुलिन बनने वाली कोशिकाओं को करता है,साथ ही शरीर के अन्य कमजोर(खराब) कोशिकाओं को भी पोषक तत्व देकर उन कोशिकाओं को रिपेयर करता है!जिस कारण डायबिटीज का पसेंट धीरे - धीरे ठीक होने लगता है,और उनका शरीर का कोई भी अंग खराब नही होता है।।

2 Comments
Very good
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