सहजन के चमत्कारिक फायदे:-
सहजनमें 92 तरह के मल्टीविटामिंस, 46 तरह के एंटीऑक्सीडेंट गुण ,36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड पाए जाते हैं। मतलब साफ है
सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है।
हमारे आस पास बहुत सारे ऐसे खाद्य पदार्थ है जो किसी खास विटामिन-मिनरल में काफी रिच होते हैं लेकिन जब हम सहजन का विश्लेषण करते हैं तो हम अचंभित रह जाते हैं उदाहरण के तौर पर इसमें संतरे के तुलना में 7 गुना ज्यादा विटामिन सी होता है। गाजर से 4 गुना ज्यादा विटामिन ,दूध से 4 गुना कैल्शियम कैल्शियम और दही से 3 गुना ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है।
पृथ्वी के हर एक इंसान को सहजन को हर दिन किसी न किसी रूप में उपयोग करना चाहिए।
दक्षिण भारत में साल भर फली देने वाले पेड़ होते है. इसे सांबर में डाला जाता है . वहीँ उत्तर भारत में यह साल में एक बार ही फली देता है. सर्दियां जाने के बाद इसके फूलों की भी सब्जी बना कर खाई जाती है. फिर इसकी नर्म फलियों की सब्जी बनाई जाती है. इसके बाद इसके पेड़ों की छटाई कर दी जाती है.
आयुर्वेद में 300 रोगों का सहजन से उपचार बताया गया है। इसकी फली, हरी पत्तियों व सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
इसके फूल उदर रोगों व कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, शियाटिका,गठिया आदि में उपयोगी है|
जड़ दमा, जलोधर, पथरी,प्लीहा रोग आदि के लिए उपयोगी है तथा छाल का उपयोग शियाटिका ,गठिया, यकृत आदि रोगों के लिए श्रेयष्कर है|
सहजन के विभिन्न अंगों के रस को मधुर,वातघ्न,रुचिकारक, वेदनाशक,पाचक आदि गुणों के रूप में जाना जाता है|
सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात, व कफ रोग शांत हो जाते है| इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया,शियाटिका ,पक्षाघात,वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है| शियाटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है,
मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं तथा मोच के स्थान पर लगाने से शीघ्र ही लाभ मिलने लगता है |
सहजन को अस्सी प्रकार के दर्द व बहत्तर प्रकार के वायु विकारों का शमन करने वाला बताया गया है|
इसकी सब्जी खाने से पुराने गठिया , जोड़ों के दर्द, वायु संचय , वात रोगों में लाभ होता है.
सहजन के ताज़े पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है.
सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है.
इसकी जड़ की छाल का काढा सेंधा नमक और हिंग डालकर पिने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है.
इसके पत्तों का रस बच्चों के पेट के किडें निकालता है और उलटी दस्त भी रोकता है.
इसका रस सुबह शाम पीने से उच्च रक्तचाप में लाभ होता है.
इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे धीरे कम होने लगता है.
इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़ें नष्ट होते है और दर्द में आराम मिलता है.
इसके कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होती है.
इसकी जड़ का काढे को सेंधा नमक और हिंग के साथ पिने से मिर्गी के दौरों में लाभ होता है.
इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सुजन ठीक होते है.
सर दर्द में इसके पत्तों को पीसकर गर्म कर सिर में लेप लगाए या इसके बीज घीसकर सूंघे.
इसमें दूध की तुलना में ४ गुना कैलशियम और दुगना प्रोटीन पाया जाता है।
सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीस कर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी नेचुरल क्लैरीफिकेशन एजेंट बन जाता है। यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है जिससे जीवविज्ञान के नजरिए से मानवीय उपभोग के लिए अधिक योग्य बन जाता है।
कैन्सर व पेट आदि शरीर के आभ्यान्तर में उत्पन्न गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह भी पाया गया है कि यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द), जोड़ो में दर्द, लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में लाभकारी है।
सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द और शहद को दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है।
आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से विषाणु जनित रोग चेचक के होने का खतरा टल जाता है।
सहजन में हाई मात्रा में ओलिक एसिड होता है जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिये अति आवश्यक है।
सहजन में विटामिन सी की मात्रा बहुत होती है। विटामिन सी शीर के कई रोगों से लड़ता है, खासतौर पर सर्दी जुखाम से। अगर सर्दी की वजह से नाक कान बंद हो चुके हैं तो, आप सहजन को पानी में उबाल कर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होगी।
इसमें कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है जिससे हड्डियां मजबूत बनती है। इसके अलावा इसमें आइरन, मैग्नीशियम और सीलियम होता है।
इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है। इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और डिलवरी के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है।
सहजन में विटामिन ए होता है जो कि पुराने समय से ही सौंदर्य के लिये प्रयोग किया आता जा रहा है। इस हरी सब्जी को अक्सर खाने से बुढापा दूर रहता है। इससे आंखों की रौशनी भी अच्छी होती है।
आप सहजन को सूप के रूप में पी सकते हैं, इससे शरीर का रक्त साफ होता है। पिंपल जैसी समस्याएं तभी सही होंगी जब खून अंदर से साफ होगा।
सहजन : आइए जानते हैं सहजन की खेती कैसे की जाती है?
आजकल सहजन की खेती पर लोगों का फॉक्स तेजी से बढ़ता जा रहा है। सहजन की खेती हमारे भाइयों के लिए अब और भी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके लिए हमारे किसान भाइयों को ज्यादा बढ़ा कोई भूमि का टुकड़ा नहीं चाहिए। इसकी खेती करने के दस माह बाद प्रति एकड़ खेत में किसान एक लाख रुपए तक कमा सकते हैं।
सहजन एक मेडिसिनल प्लांट है। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत यह है कि इसकी एक बार बुवाई करने के बाद चार वर्ष तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है। तो हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से सहजन की खेती के बारे में बताने जा रहे हैं।
सहजन की खेती कैसे करें?
सहजन एक औषधीय पौधा भी है। ऐसे में इस पौधों की खेती के साथ इसकी मार्केटिंग एवं निर्यात भी करना बहुत आसान हो गया है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सही तरीके से उगाई गई मेडिशनल क्रॉप की काफी डिमांड रहती है। क्योंकि इसी से मानव सवस्थ रह सकता है और लंबी आयु प्राप्त कर सकता है।
सहजन को अंग्रेजी में हम ड्रमस्टिक भी कहां जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलीफेरा है। इसकी खेती में पानी की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती है एवं रख–रखाव भी कम करना होता है। सहजन की खेती काफी आसान होती है एवं बढ़े पैमाने पे नहीं करना चाहते है तो अपनी सामान्य फसल के साथ इसकी खेती कर सकते हैं।
यह गर्म क्षेत्रों में आसानी से फल फूल जाता है। इसको अधिक पानी की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। सर्द क्षेत्रों में इसकी खेती बहुत प्रॉफिटेबल नहीं हो पाती है। क्योंकि इसका फूल खिलने के 25 से 30 डिग्री तापमान की आवश्यकता पड़ती है।
यह सुखी बलुई या चिकनी बलुई मिटटी में अच्छी तरह से बढ़ता है। पहले वर्ष के बाद साल में दो बार उत्पादन होता है एवं आम तौर पर एक पेड़ 10 वर्ष तक अच्छा उत्पादन करता है। इसकी प्रमुख किस्में हैं – कोयंबटूर 2, रोहित 1, पी.के.एम 1 एवं पी.के.एम 2
इससे पानी भी किया जा सकता है शुद्ध
एक नए शोध में अभी पता चला है कि सहजन के बीज पूरे पानी दे सकते है, ये पानी को शुद्ध करने में सहायक हो सकते हैं एवं विकासशील देशों में बेहद कम कीमत में लाखों लोगों को शुद्ध जल मुहैया करा सकते हैं। फिलहाल उसके बीजों का प्रयोग पानी शुद्ध करने के देशी तरीके के तौर पर किया जा रहा है हालांकि यह विधि अधिक कारगर नहीं है।
इसका लगभग हर हिस्सा खाने लायक होता है
इसकी पत्तियों को भी हम सलाद के तौर पर खा सकते हैं। सहजन के पत्ते, फूल एवं फल सभी में काफी पोषक तत्व होते हैं। इसमें औषधीय गुण भी होते हैं।
इसके बीजों से तेल भी निकलता है
बढ़ रही है इसकी मांग
सालों से सहजन का प्रयोग उपचार एवं मानव शरीर को फायदा पहुंचाने वाले गुणों की वजह से किया जाता रहा है। इसकी वजह से इसकी वैश्वविक स्तर पर इसकी मांग बढ़ रही है। सहजन के उत्पाद एवं निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कृषि एवं प्रोसेसिंग खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ( एपिडा ) निजी इकाइयों को सहयोग दे रहा है। जो जरूरी सुविधाएं तैयार कर रही हैं।
जानें कितनी होगी प्रति एकड़ कमाई:-
किसानों के मुताबिक प्रति एकड़ खेत में लगभग 1,300 पौधे लग सकते हैं। प्रति एकड़ में सहजन का पौधा लगाने का पूरा खर्चे लगभग 52 से 55हजार रुपए आएगा। सहजन की सिर्फ पत्तियां बेचकर आप सालाना 60 से 70 हजार रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। वही सहजन का उत्पादन करने पर आप सालाना एक लाख रुपए से अधिक की कमाई कर सकते हैं।

2 Comments
मेरा घर में इसका पेड़ है।
ReplyDeleteMere ghar me hamesa use hota hai
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